पंचायत चुनाव घोषित होते ही बढ़ गयी है शराब की माँग

 पंचायत चुनाव में दारू का चलन ज्यादा तेजी से बढ़ा है। जबकि इससे पहले तक चुनाव में कच्ची और देशी शराब की गांवों में धूम रहती थी। आबकारी विभाग के अंकुश और लोगों में जहरीली शराब के खौफ का नतीजा है कि देसी शराब की खपत में काफी इजाफा हुआ है।

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव ने गाँव-देहात की रौनक में चार चांद लगा दिए हैं। कोई चुनाव लड़ रहा है, तो कोई लड़वा रहा है। आज जो माहौल है उसमें कोई भी चुनाव जीतना इस बात पर नहीं निर्भर करता है कि प्रत्याशी की योग्यता क्या है ? यह भी नहीं देखा जाता है कि वह जनता के प्रति ईमानदार है या नहीं ? यही नहीं प्रत्याशी का आपराधिक रिकार्ड भी नहीं देखा जाता है। पंचायत चुनाव पूरी तरह से वर्गों और जातियों में बंटे रहते हैं। इसके अलावा प्रत्याशी की ‘हैसियत’ भी देखी जाती है कि वह चुनाव प्रचार के दौरान कितना पैसा खर्च और कितनी दावतें कर सकता है। शराब पर कितना पैसा लुटा सकता है क्योंकि पंचायत चुनाव में दस्तूर बन गया है कि दिन भर प्रचार-प्रसार और रात को शराब और कबाब का दौर चलता है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दावेदार जब वोटरों को रिझाने की कोई कसर नहीं छोड़ने का मन बनाते हैं तो सबसे पहले उनका ध्यान मुर्गा और दारू पर जाता है। दिन में जहां स्थानीय जोड़तोड़ से वोट की सेटिंग होती है, वहीं रात के अंधेरे में दावतों का दौर चलता है। इसी के चलते उत्तर प्रदेश में देशी-विदेशी दोनों दारू की खपत डेढ़ गुने से अधिक बढ़ गई है। जो दुकानदार 5000 बोतल शराब बेचते थे, वे वर्तमान में 7000 बोतल से अधिक बेच रहे हैं।

पंचायत चुनाव में विदेशी दारू का चलन इधर कुछ वर्षों से ज्यादा तेजी से बढ़ा है। जबकि इससे पहले तक चुनाव में कच्ची और देशी शराब की गांवों में धूम रहती थी। आबकारी विभाग के अंकुश और लोगों में जहरीली शराब के खौफ का नतीजा है कि देसी शराब की खपत में काफी इजाफा हुआ है। वहीं विदेशी शराब के शौकीन भी बढ़ गए हैं। वित्तीय वर्ष 2020-2021 में लॉकडाउन के चलते शराब की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई थी। लेकिन वैवाहिक मौसम के बाद पंचायत चुनाव की तैयारी के दौरान शराब बिक्री का लक्ष्य पूरा हो जाने का कयास लगाया जा रहा है। 

देशी शराब की खपत में इजाफा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पंचायत चुनाव को देखते हुए शासन के निर्देश पर पूरे प्रदेश में आबकारी विभाग की लगातार छापेमारी चल रही है। जिससे देशी शराब की मांग बढ़ गई है। शराब कारोबारियों का कहना था कि थोक गोदाम पर 20 मार्च के बाद माल नहीं मिलने की संभावना को देखते हुए तय कोटे से अधिक शराब की खरीदारी हुई है। प्रत्याशियों के नामों की घोषणा होने के पश्चात शराब की खपत में और भी इजाफा हो सकता है।

बहरहाल, एक तरफ शराब की बिक्री बढ़ी है तो दूसरी तरफ कच्ची या अवैध शराब के चलते कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी है। हाल ही में जानलेवा शराब का कहर अयोध्या पर टूटा था। यहां निर्वतमान प्रधान समेत दो लोगों की मौत हो चुकी है और पांच लोग जिंदगी बचाने के लिए संघर्षरत हैं। करीब 15 दिन पहले भी प्रयागराज, प्रतापगढ़ और चित्रकूट में जहरीली और मिलावटी शराब ने 25 से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी। इसमें से करीब 50 से ज्यादा लोग खुशकिस्मत निकले, जो समय से अस्पतालों में पहुँच गये और जिन्हें बचा लिया गया। इससे पूर्व भी कानपुर, मिर्जापुर से लेकर बुलंदशहर तक जहरीली शराब ने कोहराम मचाया था। यह स्थिति तब है जबकि योगी सरकार ने शराब से हो रही मौतों पर बेहद सख्त रुख अपना रखा है। अवैध शराब से मौतों के बाद आबकारी, पुलिस और प्रशासनिक अफसरों तक पर कठोर कार्रवाई की गई है लेकिन घटनाएं हैं कि थम ही नहीं रहीं। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि सरकार के निर्देशों को स्थानीय अफसरों ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया है। यह स्थिति चिंताजनक है वैसे भी, अब चुनौती बड़ी है क्योंकि पंचायत चुनाव के दौरान शराब मतदाताओं को बरगलाने का सबसे बड़ा हथियार बनता जा रहा है। नंबर दो की शराब की बिक्री के पीछे पूरा शराब सिंडिकेट काम करता है, इसलिए भी नकली शराब की बिक्री पर रोक लगाना कभी आसान नहीं रहा है।


यह किसी से छिपी नहीं है कि अवैध शराब बिक्री का पूरा खेल कमाई के बदंरबांट पर टिका है। शराब माफिया इसलिए नेस्तानाबूद नहीं हो पा रहे, क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा स्थानीय पुलिस, प्रशासनिक और आबकारी के तंत्र को जाता है। नेताओं की भी इसमें भागीदारी रहती है। अन्यथा ऐसी कोई वजह नहीं कि जहां गांव-गांव चौकीदारी हो, लेखपाल से लेकर पंचायत सचिव तक आए दिन भ्रमण पर रहते हों, पुलिस अपनी बीट पर चौकन्नी हो, वहां अवैध शराब की भट्ठियां धधकती रहें? यह हालात तब हैं कि सत्ता में आते ही योगी सरकार ने जहरीली शराब से मौत पर मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया है। लेकिन यह कानून भी शराब सिंडीकेट को डरा नहीं पाया।