कौन था कासिम सुलेमानी जिसे अमेरिका मानता था आतंकवादी

जनरल कासिम सुलेमानी का कद ईरान के पावर-स्ट्रक्चर में बहुत बड़ा था। ईरान के सबसे ताकतवर नेता सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के बाद अगर ईरान में किसी को दूसरा सबसे ताकतवर शख्स समझा जाता था तो वो थे- जनरल कासिम सुलेमानी।





फ्लोरिडा में अपने घर पर छुट्टियां मना रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधी रात एक ट्वीट किया जिसमें एक शब्द भी नहीं लिखा बस अमेरिका के झंडे को पोस्ट भर कर दिया। दरअसल, ट्रंप के इस ट्वीट की क्रोनोलाजी इराक के बगदाद में अमेरिकी सेना के उस एयर स्ट्राइक से जुड़ी थी। जिसमें उसने ईरान के सबसे ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी को मार डाला। ईरान रेवोल्यूशनरी गार्ड की विदेशों में काम करने वाली यूनिट कुद्स फोर्स का जिम्मा संभालने वाले सुलेमानी को अमेरिका अपने सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर देखता था। पिछले चार सालों से सुलेमानी अमेरिका के लिए सिर दर्द बने हुए थे क्योंकि ईरान पर हमले की कई अमेरिकी कोशिशों को सुलेमानी ने नाकाम कर दिया। कासिम ही थे जो पश्चिम एशिया में ईरान के लिए किसी भी मिशन को अंजाम देते थे। उनकी मौत से यकीनन एक मुल्क के तौर पर ईरान बुरी तरह जख्मी हुआ। 


 



सुलेमानी की मौत के बाद ये तो तय माना जा रहा था कि ईरान इसका बदला जरूर लेगा। आधी रात का वक्त लगभग एक बजकर तीस मिनट, सारा ईरान सोया हुआ था। इराक भी नींद की बेहोशी में डूबा हुआ है और रात के घुप्प अंधेरे में अचानक तेहरान का आसमान रोशनी से जगमगा उठता है। एक साथ 22 बेलेस्टिक मिसाइलें दो लक्ष्यों की ओर बढ़ती हैं। पहला लक्ष्य इराक के उत्तरी पश्चिमी छोर पर बसे शहर इरबिल और दूसरा बगदाद के अल असद के नजदीक अमेरिकी अड्डे। ईरानी मिसाइलें अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कहर बनकर टूट पड़ीं, गहरी नींद से जगाए गए 73 साल के डोनाल्ड ट्रंप तिलमिला उठे। ईरान ने अमेरिकी अड्डों पर हमले का वही वक्त चुना था जो अमेरिका ने जनरल सुलेमानी की हत्या के लिए चुना था। लेकिन सुलेमानी के जनाजे में उमड़े जनसैलाब ने ये बता दिया था कि ईरान के दिल में क्या था। ईरान ने दावा किया कि इन हमलों में अमेरिका के 80 सैनिक मारे गए। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई ने कहा कि ये अमेरिका के मुंह पर तमाचा है। माइनस पांच डिग्री सेल्सियस तापमान पर अकड़ा हुआ वाशिंगटन खौलने लगा। ट्रंप ने ट्वीट किया सब ठीक है। ईरान ने इराक में हमारे दो सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमला किया है। मौतों और नुकसान का पता लगाया जा रहा है। सब अच्छा है। दुनिया के दादा को ईरान ने जिस कमांडर के लिए खुली चुनौती दे डाली आइए उसके बारे में विस्तार से जानते हैं। पहले दो लाइनों में जान लीजिए की कौन था कासिम सुलेमानी।



 

कासिम सुलेमानी ईरान का सबसे शक्तिशाली सैन्य कमांडर और खुफिया प्रमुख मेजर जनरल था। जनरल सुलेमानी ईरान के सशस्त्र बलों की शाखा इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स या कुद्स फोर्स की अध्यक्षता भी कर रहा था। ये फोर्स सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को रिपोर्ट करती है।


कुद्स फोर्स 



कुद्स फोर्स ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा है। इसे ईरान की सबसे ताकतवर और धनी फौज माना जाता है। कुद्स फोर्स का काम है विदेशों में ईरान के समर्थक सशस्त्र गुटों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया कराना, कासिम सुलेमानी इसी कुद्स फोर्स के प्रमुख थे।

 

ईरान का दूसरा ताकतवर शख्स

जनरल कासिम सुलेमानी का कद ईरान के पावर-स्ट्रक्चर में बहुत बड़ा था। ईरान के सबसे ताकतवर नेता सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के बाद अगर ईरान में किसी को दूसरा सबसे ताकतवर शख्स समझा जाता था तो वो थे- जनरल कासिम सुलेमानी।

 

जनरल सुलेमानी लंबे समय तक पर्दे के पीछे रहकर अभियानों की अगुआई करते रहे, मगर कुछ साल पहले वो खुलकर सामने आए और इसके बाद वो ईरान में इतने लोकप्रिय हो गए कि उनके ऊपर लेख लिखे गए, डॉक्यूमेंट्रियां बनीं और यहां तक कि पॉप गीत भी बनने लगे।

 

ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत किरमान के एक गरीब परिवार से आने वाले सुलेमानी 13 साल की आयु से अपने परिवार के भरण पोषण में लग गए। उनकी पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पाई थी। अपने खाली समय में वे वेटलिफ्टिंग करते और खामेनेई की बातें सुनते थे। फॉरेन पॉलिसी पत्रिका के मुताबिक सुलेमानी 1979 में ईरान की सेना में शामिल हुए और महज छह हफ्ते की ट्रेनिंग के बाद पश्चिम अजरबैजान के एक संघर्ष में शामिल हुए थे। ईरान-इराक युद्ध के दौरान इराक की सीमाओं पर अपने नेतृत्व की वजह से वे राष्ट्रीय हीरो के तौर पर उभरे थे। बताया जाता है कि वो देखते-देखते ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खुमैनी के बेहद करीब आ गए। सुलेमानी ने इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के मुकाबले कुर्द लड़ाकों और शिया मिलिशिया को एकजुट करने का काम किया। हिज्बुल्लाह और हमास के साथ-साथ सीरिया की बशर अल-असद सरकार को भी सुलेमानी का समर्थन प्राप्त था।


अमेरिका मानता था दुश्मन



सुलेमानी को अमेरिका अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक मानता था। अमेरिका ने कुद्स फोर्स को साल 2007 से आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया और इस संगठन के साथ किसी भी अमेरिकी के लेनदेन किए जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका सुलेमानी को अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक मानता था। साल 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की कुद्स फोर्स को आतंकवादी और इसके प्रमुख कासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था। इसके बाद से ही जनरल सुलेमानी अमेरिका के निशाने पर थे। 3 जनवरी को जब बगदाद एयरपोर्ट पर उनके दो कारों के काफिले पर ड्रोन से निशाना लगाया गया, उस वक्त वो जिन लोगों के साथ सफर कर रहे थे, उनमें कताइब हिज्बुल्लाह के नेता अबु महदी अल-मुहांदिस भी थे।

 

अमेरिका से बदले की आग में जल रहे ईरान के अलावा इराक में भी जनरल सुलेमानी की मौत के बाद गुस्सा दिखा। इराक की सेना ने न सिर्फ इस हमले की निंदा की बल्कि सेना को तैयार रहने को भी कह दिया। बता दें कि सुलेमानी ने सिर्फ ईरान के लिए ही नहीं बल्कि सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई के कहने पर आईएसआईएस से निपटने के लिए इराक सरकार की आतंकियों से रणनीतिक तौर पर लड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। बगदाद को इस्लामिक स्टेट के आतंक से बचाने के लिए उनके ही नेतृत्व में ईरान समर्थक फोर्स का गठन हुआ था। जिसका नाम पापुलर मोबलाइजेशन फोर्स था। सुलेमानी अमेरिका के कितने पुराने दुश्मन थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980 के दशक में ईरान और इराक के बीच खूनी जंग में उनकी अहम भूमिका थी। अमेरिका ने इस जंग में युद्ध में इराक तानाशाह सद्दाम हुसैन का साथ दिया था। इस युद्ध से ही सुलेमानी किसी हीरो की तरह उभर कर सामने आए थे। सुलेमानी सीरियाई संघर्ष में राष्ट्रपति बशर अल असद के सलाहकार के रूप में भी देखे जाते थे। इतना ही नहीं उन्होंने यमन से लेकर इराक और दूसरे मुल्कों से रिश्तों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार कर लिया था। ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके। जाहिर है उनकी मौत से मिडिल ईस्ट के एक बार फिर बुरी तरह अस्थिर साबित हो रहा है। 

 

इस हमले की कहीं आलोचना हो रही है, तो कहीं लोग इसे अपना समर्थन दे रहे हैं। इस हमले के बाद ईरान तो इसकी निंदा कर ही रहा है, पाकिस्तान से भी विरोध से सुर बुलंद होते दिखे। वॉशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क और लंदन की सड़कों पर भी इस ड्रोन हमले का विरोध करने वाले खूब दिख रहे हैं। देखा जाए तो दुनियाभर से इस हमले को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।