'एक देश एक चुनाव' ख्याल तो अच्छा है, पर ये हैं बड़ी बाधाएं



एक राष्ट्र एक चुनाव का विरोध करने वाले राजनीतिक दल यह जरूर भूल गए कि यह कोई नया विचार नहीं है बल्कि 1952, 1957, 1962, 1967 में ऐसा हो चुका है।




लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने का मुद्दा जोरों पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाकर 'एक राष्ट्र एक चुनाव' का सहयोग करने के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से कहा लेकिन 14 दल ऐसे हैं जिन्होंने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया और कुछ दल ऐसे भी थे जिन्होंने हिस्सा तो लिया पर बैठक के बाद इसका खुलकर विरोध किया। इसमें माकपा, भाकपा, आम आदमी पार्टी समेत कई पार्टियां शामिल थीं। हालांकि यह कोई पहली दफा नहीं था जब एक राष्ट्र एक चुनाव पर चर्चा हुई हो इसके पहले भी कई मंचों पर इसका जिक्र किया जा चुका है।


कोई नया विचार नहीं है 'एक राष्ट्र एक चुनाव' 


एक राष्ट्र एक चुनाव का विरोध करने वाले राजनीतिक दल यह जरूर भूल गए कि यह कोई नया विचार नहीं है बल्कि 1952, 1957, 1962, 1967 में ऐसा हो चुका है। यह क्रम उस वक्त टूटा था जब 1968-69 में कुछ विधानसभाएं समय से पहले भंग कर दी गईं थीं इसलिए फिर चुनाव एक साथ मुमकिन नहीं हो सका और अब आलम यह है कि देश हमेशा चुनाव के मूड में ही रहता है। हाल ही में लोकसभा चुनाव के साथ 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न हुए ही थे कि अब झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 


आज भी है 'एक राष्ट्र एक चुनाव संभव'


हमेशा से यह कहा जा रहा है कि हमें इतिहास से सीखना चाहिए तो फिर एक देश एक चुनाव पर राजनीतिक पार्टियां विरोध क्यों दर्ज करा रही हैं। विगत वर्षों की तरह आज भी एक राष्ट्र एक चुनाव संभव है बशर्ते संविधान में कई सारे संशोधन करने होंगे। जैसे कई राज्यों की विधानसभाओं का समय कम एवं कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाना होगा तभी चुनाव मुमकिन हो पाएगा। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने एक समाचार पत्र में लिखे अपने कॉलम में कहा कि समय से पहले विधानसभा भंग हो जाने को लेकर भी एक संशोधन करना पड़ेगा कि चुनाव से पहले अगर विधानसभा भंग होती है तो क्या व्यवस्था होगी


अगर हम चुनाव की बात करें तो हिन्दुस्तान में चुनाव को उत्सव को तौर पर देखा जाता है और हमेशा ही देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव चल ही रहा होता है। ऐसे में प्रशासनिक एवं नीतिगत निर्णय के साथ-साथ देश के खजाने पर भी इसका असर पड़ता है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने हिन्दुस्तान में हुए चुनाव के खर्चों को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 के आम चुनाव में 60,000 करोड़ रुपए खर्च हुआ था जो दुनिया का सबसे मंहगा चुनाव माना जा रहा है। इस चुनाव में औसतन एक वोट पर करीब 700 रुपए खर्च हुए हैं। 


वहीं साल 2014 की बात की जाए तो इस चुनाव में दोगुना पैसा खर्च हुआ है। जबकि साल 1998 में हुए चुनाव में महज 9,000 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अगर एक राष्ट्र एक चुनाव को नहीं अपनाया गया तो यह खर्च और भी ज्यादा बढ़ेगा और इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। 


'एक राष्ट्र एक चुनाव' से कम होगा सुरक्षाबलों पर दबाव


इस व्यवस्था को बहाल किए जाने के बाद पैसे के खर्च में कमी होगी साथ ही सुरक्षाबलों पर भार भी कम होगा। चुनाव के वक्त संवेदनशील माने जा रहे अनंतनाग सीट पर तीन अलग-अलग तारीखों पर चुनाव हुए, जबकि त्रिपुरा वेस्ट सीट पर चुनाव की तारीख बदलनी पड़ी थी। अगर एक देश एक चुनाव व्यवस्था देश में बहाल होती है तो सुरक्षाबलों से भी दबाव कम हो जाएगा और वह देश की बेहतरी के लिए अपना काम आसानी से कर पाएंगे। 


इस व्यवस्था के लागू होने के बाद सुरक्षाबलों की ज्यादा जरूरत होगी क्योंकि देश में करीब 10 लाख के आस-पास मतदान केंद्र हैं और हर मतदान केंद्र में अगर 5 हजार जवान तैनात किए गए तो 50 लाख सुरक्षाकर्मियों की जरूरत पड़ेगी। इसका मतलब है कि 50 हजार कंपनियां। ऐसे में पाकिस्तान और बांग्लादेश से जुड़ी सीमाओं पर तैनात जवानों को तो बुलाया नहीं जा सकता तो सिर्फ चुनाव आयोग को 3,000 कंपनियां ही मिल पाएगी। यही वजह थी कि इस बार के लोकसभा चुनाव में सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी को देखते हुए चुनाव सात चरण में कराए गए। अगर व्यवस्था लागू हो गई तो कितने चरण में चुनाव होंगे यह भी एक पेचीदा सवाल है? 




 







 


 











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