भारत के संविधान और लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था आपातकाल


जयप्रकाश नारायण की जनसभा के चंद घंटों बाद ही भारतीय आजादी के बाद का सबसे मनहूस क्षण आया जब गैरकानूनी तरीके से अपनी सत्ता को बचाने के लिए संवैधानिक मान-मर्यादाओं को कुचलते हुए देश पर आपातकाल थोप दिया गया।




जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के एक फैसले ने देश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में राजनारायण इंदिरा गांधी के विरुद्ध रायबरेली से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे। उस चुनाव में इंदिरा गांधी पर अनियमितता के आरोप में राजनारायण द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने न केवल इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया, बल्कि उन्हें छह वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य भी घोषित कर दिया। उन पर चुनाव के दौरान भारत सरकार के अधिकारी और अपने निजी सचिव यशपाल कपूर को अपना इलेक्शन एजेंट बनाने, स्वामी अवैतानंद को 50,000 रुपये घूस देकर रायबरेली से ही उम्मीदवार बनाने, वायुसेना के विमानों का दुरुपयोग करने, डीएम-एसपी की अवैध मदद लेने, मतदाताओं को लुभाने हेतु शराब, कंबल आदि बांटने और निर्धारित सीमा से अधिक खर्च करने जैसे तमाम आरोप लगे थे। फैसले वाले दिन इंदिरा गांधी के आवास पर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी थीं जो भावी राजनीतिक घटनाक्रम की दिशा स्पष्ट कर रही थीं। कांग्रेसियों के जत्थे 'जस्टिस सिन्हा-मुर्दाबाद' के नारे लगाते हुए अदालती फैसले को सीआइए की साजिश भी बता रहे थे। शाम तक मंत्रिमंडल ने एक स्वर से उनके इस्तीफे को नकार दिया। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने 'इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा' का नारा देकर उस दौर में सियासी बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी थीं।

 


12 जून के बाद समूचा विपक्ष फिर एकजुट हुआ और न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग पर अड़ा रहा। पूरा विपक्ष राष्ट्रपति भवन के सामने धरना देकर अपना विरोध दर्ज करा रहा था। देश भर के शहर, जलसे, जुलूस और विरोध प्रदर्शन के गवाह बन रहे थे। 22 जून को दिल्ली में आयोजित रैली को जेपी समेत कई अन्य बड़े नेता संबोधित करने वाले थे। शासक दल इतना भयभीत था कि उसने कोलकाता-दिल्ली के बीच की वह उड़ान ही निरस्त करा दी जिससे जेपी दिल्ली आने वाले थे। उन दिनों एक या दो उड़ानों का ही संचालन हुआ करता था।

 

आखिरकार 25 जून का दिन विरोध सभा के लिए तय हुआ। रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। मुख्य वक्ता के तौर पर जेपी जब संबोधन के लिए आए तब काफी देर तक नारेबाजी होती रही। जेपी ने स्पष्ट शब्दों में इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की और जनसमर्थन के अभाव वाली सरकार के अस्तित्व को मानने से इन्कार कर दिया। सभा के चंद घंटों बाद ही भारतीय आजादी के बाद का सबसे मनहूस क्षण आया जब गैरकानूनी तरीके से अपनी सत्ता को बचाने के लिए संवैधानिक मान-मर्यादाओं को कुचलते हुए देश पर आपातकाल थोप दिया गया। सभी मूलभूत अधिकार समाप्त कर दिए गए। समाचार पत्रों पर भी पाबंदी लगा दी गई थी। विपक्षी दलों के प्रमुख नेता नजरबंद कर दिए गए। सभा, जुलूस, प्रदर्शन सभी पर रोक लगा दी गई थी। राजनीतिक बंदियों की परिवारों से मुलाकात तक पर पाबंदी लगा दी गई। अदालतें स्वयं कैद हो चुकी थीं जो जमानत लेने और देने से साफ इन्कार कर रही थीं। एक लाख से अधिक राजनेता-कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारी के समय मानसिक-शारीरिक यातनाएं सहनी पड़ीं। पुलिस हिरासत और जेलों से मौत की खबरें आ रही थीं जिन्हें समाचार पत्रों में जगह नहीं मिलती थी। यह दौर करीब ढाई साल तक चलता रहा।

 


-के.सी. त्यागी

(आपातकाल के दौरान जेल में रहे लेखक जद-यू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)



 

 


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