मतदाताओं की आखिर इतनी बेरुखी का कारण क्या है


मतदाताओं की आखिर इतनी बेरुखी का कारण क्या है


देश के निर्वाचन आयोग की जितनी तारीफ करो वह कम है। निर्वाचन आयोग ने दुनिया के सामने निष्पक्ष और साफ सुथरा चुनाव कराने की आदर्श मिसाल पेश की है। सारी दुनिया हमारी चुनाव व्यवस्था की कायल है। अब तो हमारे देश में इलेक्शन टूरिज्म भी जोर पकड़ने लगा है। विदेशों से लोग घूमने के बहाने यहां आकर हमारी चुनावी प्रक्रिया को देख रहे हैं।




 



प्रश्न यह उठता है कि मतदाताओं की आखिर इतनी बेरुखी का कारण क्या है? क्यों मतदाता लाख प्रयासों के बावजूद मतदान केन्द्र तक जाकर अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर रहा? आखिर क्या कारण है कि चर्चा करने में तो हर मतदाता आगे हैं पर अपने दायित्व को पूरा करने में पीछे रह रहा हैं? क्यों आम मतदाता अपने अधिकार की बात तो कर रहा है पर अपने दायित्व या यों कहे कि अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ रहा है? प्रश्न यह भी है कि क्या मतदाता का अपना कोई दायित्व नहीं हो जाता? मतदाता देश का जिम्मेदार नागरिक है और इस नाते अपनी पंसद की सरकार बनाने और अपनी पंसद के नेता को मतदान कर संसद तक भेजने का उसका दायित्व हो जाता है उसके बाद भी वह अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए उत्साहित नहीं दिख रहा। 

 

देश के निर्वाचन आयोग की जितनी तारीफ करो वह कम है। निर्वाचन आयोग ने दुनिया के सामने निष्पक्ष और साफ सुथरा चुनाव कराने की आदर्श मिसाल पेश की है। सारी दुनिया हमारी चुनाव व्यवस्था की कायल है। अब तो हमारे देश में इलेक्शन टूरिज्म भी जोर पकड़ने लगा है। विदेशों से लोग घूमने के बहाने यहां आकर हमारी चुनावी प्रक्रिया को देख रहे हैं। इसके अलावा चुनावी प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने के साथ ही चुनाव आयोग अभियान चलाकर लोगों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहा है। लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए पुलिस और यहां तक कि आवश्यकतानुसार सुरक्षा बलों तक की तैनाती कर रहा है। यही कारण है कि आज चुनावों में बूथ केप्चरिंग या बाहुबलियों के डर से मतदाताओं में भय की स्थित लिगभग शून्य पर पहुंच गई है। मतदान केन्द्र भी मतदाताओं के नजदीक बनाया जा रहा है। लोगों को मतदान परचियों के लिए भी अब राजनीतिक दलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता बल्कि स्वयं चुनाव आयोग उपलब्ध करा रहा है। मीडिया के माध्यम से मतदान की सारी प्रक्रिया को समझाया जा रहा है। ऐसे में आममतदाताओं का भी दायित्व हो जाता है कि वे मतदान केन्द्र तक जाएं और मताधिकार का उपयोग करे। 

 

एक बात और सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाती है और वह यह कि जो जिम्मेदार नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करता है उसे सरकार के किसी भी कदम पर टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है। सरकार की आलोचना करना तो आसान है पर करीब 30 फीसदी लोग अपने दायित्व का निवर्हन नहीं करते हैं तो इससे निराशाजनक और क्या होगा? आखिर देश के प्रत्येक मतदाता का यह दायित्व हो जाता है कि वह पांच साल के लिए चुनी जाने वाली सरकार के लिए मतदान कर अपने कर्तव्य को पूरा करे। कितनी दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि 17 वीं लोकसभा के चुनाव आते आते भी हम मतदान के आंकड़े को 90 फीसदी तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। क्या इसे यह माना जाए कि 30 फीसदी लोगों का तो विश्वास ही कहीं और है। 



 

अभी भी दो सौ से अधिक लोकसभा सीटों के लिए मतदान होना है, कई प्रदेशों की सभी सीटों के लिए मतदान पूरा हो चुका है पर राजस्थान सहित कई प्रदेशों की 240 सीटों के लिए मतदान आने वाले चार चरणों में होने जा रहा है। अब प्रत्येक मतदाता का दायित्व हो जाता है कि वह व्यवस्था को कोसने के स्थान पर अपने मताधिकार के दायित्व को पूरा करने के लिए आगे आए और अपने मताधिकार का प्रयोग करें। आखिर लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही तो खूबी है कि जनता स्वयं अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजती है तो हमारे देश के निर्वाचन आयोग की भी यह खूबी है कि वह निष्पक्ष, स्वतंत्र और भयहीन चुनावों की व्यवस्था सुनिश्चित कर रहा है। ऐसे में आम मतदाता को घर से बाहर निकल कर मतदान केन्द्र तक तो पहुंचना ही होगा। उसे भी लोकतंत्र के इस महायज्ञ में अपनी भूमिका निभानी ही होगी। कुछ गैरजिम्मेदाराना सोच वाले व्यक्तियों द्वारा मतदान के बहिष्कार जैसी छुटपुट स्थितियां पैदा की जाती है वह लोकतंत्र के लिए घोर निराशाजनक है। मेरा अपना मानना तो यह भी है कि नोटा का प्रयोग कोई समाधान नहीं माना जा सकता। नोटा के प्रयोग से हम अपना विरोध तो जाहिर कर देते हैं वहीं कुछ स्थानों पर नोटा का प्रयोग चुनाव परिणामों को प्रभावित करने में भी सफल रहता है पर यह कोई समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता।


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