हलाल का हल्ला: आयुर्वेद व ऋषि-परंपरा को मुस्लिम देशों ने अपनाया

अधिकांश लोगों की मुख्य आपत्ति यह भी है कि हलाल सर्टिफिकेट के लिए दी गई फीस इस्लामी कट्टरपंथ को फैलाने में इस्तेमाल की जाती है। इसलिए ये सर्टिफिकेट नहीं लेना चाहिए। लेकिन तब शायद सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि अरब देशों से तेल खरीद कर जो पैसा हम वहाँ पहुंचाते हैं, क्या उस पर ये सवाल नहीं बनता? इसके उलट निर्यात तो पैसा लेकर आता है।



बाबा रामदेव के उत्पादों को हलाल सर्टिफिकेट प्राप्त है, ये बात ज़्यादातर लोगों को हजम नहीं हो रही है। हालाँकि सर्टिफिकेट हाल फिलहाल में नहीं लिया गया है, इसे हासिल किए हुए समय गुजर गया, लेकिन मुद्दों की एक प्रकृति ये भी होती है कि वो ज़्यादा भाव नहीं खाते, उन्हें जब उछाला जाए वो उछल जाते हैं। यद्यपि समय ही चीजों को नया-पुराना बनाता है किन्तु ऐसे मामलों में समय की गठरी में कोई नीचे और ऊपर की तह नहीं होती। इसलिए पुराना उछला या नया उछला ये ज्यादा मायने नहीं रखता।


लॉकडाउन की फुर्सत उस उछाल को और भी अधिक ऊँचाई, विस्तार और स्वीकार्यता प्रदान करती है। लॉकडाउन ने आजकल हमें भी इतनी फुर्सत दे रखी है कि जब ये उछला तो हमने भी इसे लपकने के लिए अपनी छलनी लगा दी। उस छलनी में से क्या निकला और क्या अटका यही साझा करने के लिए ये लेख लिखा गया।


पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के प्रबंध निदेशक व सह संस्थापक आचार्य बालकृष्ण ने कल अपने ट्विटर व फेसबुक के माध्यम से ‘हलाल का हौवा’ हैशटैग के साथ लिखा- “पतंजलि के हलाल सर्टिफिकेट लेने पर क्या यह हिन्दू संस्था नहीं रही? या उसके उत्पाद शाकाहारी नहीं हैं? स्वदेशी उत्पाद अरब सहित अनेक मुस्लिम देशों में निर्यात करने हेतु बरसों पहले लिए गए सर्टिफिकेट के आधार पर हल्ला मचाने वाले राष्ट्रभक्त हैं या षड्यंत्रकारी, यह आप स्वयं विचार करें।” उनके इस कथन से उनके स्पष्टीकरण के बिंदु यानी इस प्रसंग में पतंजलि पर लगे आरोपों और इसके पीछे छिपी किसी गलत मंशा की चिंता छिपी हुई है।


आरोप हैं- हिंदुत्व, शाकाहार और राष्ट्रभक्ति से समझौता। क्या सचमुच पतंजलि ने अपने इन घोषित आदर्शों से समझौता कर लिया? आपातत: यही प्रतीत होता है। इसलिए ज़्यादातर मुद्दों पर जहाँ लोग खुद को ‘हाँ’ और ‘ना’ में बाँट लेते हैं, वहीं इस मुद्दे पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि इस बार उनकी ‘हाँ’ और ‘ना’ ही बँट गई है। हलाल के बारे में पूर्ण जानकारी का अभाव उनके समर्थन और विरोध दोनों को असहज बना रहा है।


इस्लामी शरिया के अनुसार ‘हलाल’ शब्द ‘हराम’ का विपरीतार्थी है। न केवल खान-पान बल्कि पहनना, बोलना या कोई भी कार्य करना हलाल या हराम के अंतर्गत आ सकता है। हलाल अर्थात् विधि और हराम मतलब निषेध।


कुछ दिनों पहले हलाल शब्द मांसाहार के प्रसंग में अधिक चर्चा में रहा। इसलिए अधिकतर लोगों को लगता है कि हलाल यानी विशेष इस्लाम अनुमोदित विधि से तैयार कर खाने की मेज तक पहुँचाया गया मांस। कदाचित् इसीलिए लोगों को आशंका हुई कि पतंजलि ने हलाल सर्टिफिकेट लिया है तो इसका मतलब अब वो शायद पूर्ण शाकाहारी नहीं रही।


अरब देशों में हलाल सर्टिफिकेट सभी खाद्य वस्तुओं और दवाई आदि अन्य वस्तुओं के विक्रय पर अनिवार्य है। शरिया के अनुसार जो चीजें मुस्लिमों को खाने की अनुमति है, वो सब भी हलाल के अंतर्गत आती हैं, चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी। यानी शाकाहार भी हलाल हो सकता है। इसलिए पतंजलि को हलाल सर्टिफिकेट लेने के लिए शाकाहार को त्यागने की आवश्यकता नहीं है। उसे ये सर्टिफिकेट लेने के लिए अपने उत्पादों में कोई परिवर्तन नहीं करना।


देखा जाए तो हलाल का कायदा तो यह भी कहता है कि वस्तु की उत्पादन प्रक्रिया में शुरू से अंत तक सिर्फ मुसलमान ही शामिल होने चाहिए तभी वो वस्तु हलाल यानी उपयोग के लिए स्वीकार्य हो सकती है। क्या वो स्वयं अपने इस उसूल पर कायम हैं? दुनिया भर की सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हलाल सर्टिफिकेट है, तो क्या उन सबने अपनी कंपनियों में और लोगों को हटाकर मुसलमानों को काम पर रख लिया? क्या पतंजलि ने ऐसा किया? क्या पतंजलि ने हलाल के लिए अपनी उत्पादन प्रक्रिया में कोई परिवर्तन किया?


आप पतंजलि के अधिकारियों से बात करके देखिए, ऐसा कोई बदलाव किसी भी स्तर पर नहीं हुआ। आप स्वयं देख सकते हैं कि अपने सिद्धांतों से समझौता किसे करना पड़ा। पतंजलि के उत्पाद जैसे पहले थे, वैसे ही अब भी हैं। तो हलाल सर्टिफिकेट से नया क्या हुआ? नया सिर्फ ये हुआ कि भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक ऋषि-परम्परा के ज्ञान पर आधारित उत्पादों को मुस्लिम देशों ने भी निरापद व अपनाने योग्य माना। क्या इससे किसी का राष्ट्रवाद या धार्मिक भावना आहत होती है?


‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष हमें प्रेरणा देता है कि आर्यत्व यानी मानव मात्र के लिए हितकारी श्रेष्ठ परम्पराएँ व मान्यताएँ विश्व भर में फैले। थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ यही होता भी आया है, किन्तु हमने इसे कभी भी तलवार के बल पर नहीं किया। सदियों से इस भारत धरा ने अनेक क्षेत्रों में उच्च मानदंड स्थापित किए और दुनिया ने उन्हें सराहा, इस धरती की ज्ञान परम्परा का आदर किया और उससे सीखा क्योंकि भारत की मनस्विता ने सार्वभौम लाभ को सर्वोपरि रखा। क्या हम वर्तमान भारतवासी उस परम्परा पर उतना ही विश्वास या आत्मविश्वास रखते हैं, जो उसको सार्वभौम आकार देने के लिए पर्याप्त हो? ये छोटी-छोटी आशंकाएँ उसके मार्ग में अनावश्यक बाधा ही बनेंगी।


‘सर्वे सन्तु निरामया:’ की भावना पर आधारित आयुर्वेद की प्रेरणा से निर्मित वस्तुएँ यदि देश-विदेश में स्वीकार्यता प्राप्त कर लें तो ये देश के लिए भी गौरव की बात होगी। योग-आयुर्वेद की निर्विवाद स्वीकार्यता न तो किसी हिन्दू के लिए चिंता की बात हो सकती है, न ही किसी राष्ट्रवादी के लिए। हाँ जिस दिन हम सस्ती स्वीकार्यता हासिल करने के लिए अपने मानदंडों से समझौता कर लेंगे, उस दिन हमें चिंता ज़रूर करनी पड़ेगी।


अधिकांश लोगों की मुख्य आपत्ति यह भी है कि हलाल सर्टिफिकेट के लिए दी गई फीस इस्लामी कट्टरपंथ को फैलाने में इस्तेमाल की जाती है। इसलिए ये सर्टिफिकेट नहीं लेना चाहिए। लेकिन तब शायद सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि अरब देशों से तेल खरीद कर जो पैसा हम वहाँ पहुंचाते हैं, क्या उस पर ये सवाल नहीं बनता? इसके उलट निर्यात तो पैसा लेकर आता है।


हलाल सर्टिफिकेट की फीस से पता नहीं कितने कारतूस खरीदे जाएँगे, किन्तु वहाँ अपने उत्पाद बेचकर कमाया मुनाफ़ा अपने ही देश में लगेगा, इसमें कोई संशय नहीं। लेकिन इस बात पर सिर्फ यहीं चुप भी नहीं हुआ जा सकता। मांसाहार के मुस्लिम कायदों को एक तरफ रख भी दें तो सभी शाकाहारी उत्पाद तो अपने आप ही (by default) शरिया के मुताबिक़ हलाल हैं, ऐसी स्थिति में हलाल सर्टिफिकेट की क्या ज़रूरत है? और यदि है भी, यदि मुस्लिम उपभोक्ता को अपने धर्म के नज़रिए से अतिरिक्त विश्वसनीयता चाहिए भी तो ऐसे उत्पादों पर प्रमाणपत्र बाँटने के लिए फीस वसूल करने का क्या तुक है? और क्या ये फीस इस बात के लिए लगाई जा रही है कि मुस्लिम उनका सामान खरीद कर उन पर कोई उपकार कर रहे हैं?


प्रमाणन की प्रक्रिया में जो खर्च आता है, उसे वो वहन करें जिन्हें इस प्रमाण पत्र की ज़रूरत है। किन्तु आज के व्यापार में सब कुछ बाज़ार आधारित ही है तो स्पष्ट है कि सब कम्पनियाँ सापेक्ष लाभ को देखते हुए इसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की ज़रूरत भी नहीं समझती। फीस की मात्रा को कम समझ कर इस तरह के मनमानेपन को चलने देना कतई सही नहीं है। दुनिया की सभी कंपनियों की ये थोड़ी-थोड़ी फीस इकट्ठी होकर इतनी हो ही जाएगी जो इस आपत्ति को सही ठहरती है कि आखिर उस पैसे का प्रयोग किस काम में होता है? आज नहीं तो कल दुनिया भर की कंपनियों को इसे समझना होगा कि आखिर उन्हें ये फीस किस नाम की देनी पड़ती है।


मुद्दा पतंजलि के हलाल प्रमाणपत्र से शुरू हुआ था तो चलिए इस बारे में कुछ और आपत्तियों का रुख करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं, जिनके पास विरोध के लिए और कोई तर्क नहीं है बस उन्हें पतंजलि के मुनाफे से आपत्ति है। वास्तव में ये एक स्थायी आपत्ति है, जिसकी स्थापना पतंजलि के साथ-साथ ही हो गई थी। जब-जब पतंजलि को मुनाफा होता है तब-तब ये स्थायी विरोध ऐसे उछलता है मानो यही पतंजलि का शेयर सूचकांक हो।


अब पतंजलि को शेयर बाज़ार में तो प्रवेश करना नहीं तो ये भी उतार-चढ़ाव को नोट करने का एक मनोरंजक ज़रिया हो सकता है। तो लोगों को अक्सर ये आपत्ति रहती ही है कि एक संन्यासी बाबा इतनी बड़ी कम्पनी काहे चला रहा है। वास्तव में वो ये नहीं जानते कि बाबा के गेरुए वस्त्रों की सीमा बाबा के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े आदर्शों तक है। कर्म छोड़कर बैठ जाना संन्यास नहीं है, वो तो सबको मरते दम तक करना है। हाँ इतना ज़रूर है कि बाबा का कर्म उनके संन्यास आश्रम के आदर्शों के विरुद्ध न हो, ये देखना उनकी अपनी ज़िम्मेदारी है। और जब कर्मफल से सभी बँधे हुए हैं तो आप अपनी चिंता करें बाबा अपनी चिंता खुद कर लेंगे।


ऐसी आपत्तियाँ अधिकतर वही उठाते हैं जो खुद को संवैधानिक व्यक्तिगत अधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार समझते हैं और ज़्यादातर अपने दोहरे मानदंडों के लिए कुख्यात हैं। उन्हें ये कभी समझ नहीं आएगा कि ऐसे छोटे-छोटे व्यक्तिगत विरोधों के लिए और भी मौके होते हैं। बात जब देश से बाहर की हो, कम से कम तब हम ऐसी मानसिकताओं को कुछ देर के लिए विश्राम दे दें। लेकिन ऐसा करने में समस्या एक और भी तो है। स्वदेशी की पहचान दुनिया में बढ़ रही है, इतना बड़ा श्रेय किसी एक को कैसे दे दिया जाए? अब आपको अनुलोम-विलोम और भ्रामरी की ज़रूरत है। इससे मन शांत होता है और संतोष बढ़ता है।


आपत्ति तो वास्तव में ये होनी चाहिए कि अरब देशों में व्यापार के लिए हलाल सर्टिफिकेट क्यों अनिवार्य है? क्या वहाँ मुस्लिमों के अलावा अन्य धर्मों के अनुयायी नहीं रहते? क्या उन्हें अपनी पसंद की चीजों को खरीदने का कोई हक़ नहीं है? आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा पद्धतियों के वो उत्पाद जो हलाल नहीं हैं किन्तु सेहतमंद हैं, उन्हें इस्तेमाल करने के अरब निवासी भारतीयों के हक़ या अन्य देशों के मूल निवासियों के हक़ को छीनना जायज है? शांतिप्रियता और विश्वबंधुत्व के नाम पर दुनिया के सभी देशों में वहाँ के कानूनों से ऊपर उठ कर छूट लेने वाले समुदाय को क्या अपने देश में अन्य लोगों को ऐसे अधिकार नहीं देने चाहिए?


खैर छोड़िए, कितने हास्यास्पद और महीन मुद्दे हैं ये। इतने महीन कि हमारी मुद्दे लपकने की छलनी के एक ही छेद से ये सब एक साथ पार हो जाएँगे और पता भी नही चलेगा कि किधर गए, सब स्वीकार है। भारत जैसे अत्यंत उदार देश में भी तरह-तरह की आजादियों का शोर मचाने वाले पक्षपाती भोंपुओं का स्वर इन देशों के प्रतिबंधों पर कंठ सुधारक वटी की पूरी डिब्बी खाकर भी आवाज़ नहीं निकल पाएगा।


अंत में यही अपील कि हमें ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ के ‘कुछ बात’ को समझना होगा। इस ‘कुछ बात’ की सबसे बड़ी बात है हमारा समावेशी होना। जब हम अपने देश में अन्य देशों के लोगों और परम्पराओं को खुले मन से स्वीकार कर लेते हैं तो अपने देश की परम्पराओं को अन्य देशों में स्वीकार्यता मिलने पर आपत्ति करना कौन से किस्म की उदारता है?


हम सब जानते हैं कि भारत को पददलित करना दुनिया के किसी देश के वश की बात नहीं, इसे सदैव हमारे आपसी विद्वेष ने उनके लिए संभव बनाया है। अत: भारत और भारतीय संस्कृति के शुभचिंतकों को चाहिए कि जिस संस्कृति से वो इतना लगाव रखते हैं और सचमुच उससे प्रेम करते हैं, उसके लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाएँ। हमारी परम्पराएँ दुनिया में स्वीकार्य हो रही हैं तो उसमें हमारी विजय निहित है। इस विजय पर खुश हों, आशंकित नहीं।