मोदी सरकार को दबाव में नहीं लाया जा सकता, CAA विरोधी यह बात समझ नहीं पा रहे

देशभर में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाली कथित ताकतों के साथ−साथ दुश्मन मुल्कों भी यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखकर वहां की सरकार द्वारा लिए फैसलों पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।





लखनऊ के घंटाघर पार्क सहित देश−प्रदेश के तमाम हिस्सों में नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के विरोध में धरना−प्रदर्शन करने वालों को उम्मीद के अनुसार राजनैतिक दलों का समर्थन नहीं मिलने से करीब दो माह से चल रहे विरोध−प्रदर्शन की 'हवा' निकलना शुरू हो गई है, जो चंद नामचीन हस्तियां और नेतागण सीएए, एनसीआर, एनपीए की मुखालफत करने वालों के सुर में सुर मिला भी रही हैं, उनकी हैसियत इतनी नहीं दिखाई पड़ती है जो वह मोदी सरकार को झुका सकें या फिर इस विरोध को जन−आंदोलन का रूप दे सकें। दरअसल, जब भी किसी संस्था या व्यक्ति द्वारा निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी प्रकार का कथित आंदोलन चलाया जाता है तो ऐसे आंदोलनों का यही हश्र होता है।

 


सबसे बड़ी बात यह है कि धीरे−धीरे आम जनता यह समझ गई है कि सीएए का भारत के लोगों की नागरिकता से कोई लेना−देना नहीं है। किसी भारतीय को देश निकाला दिया जाना असंभव है। कुछ लोगों द्वारा मुसलमानों के बीच कथित तौर पर भ्रम भी फैलाया जा रहा है कि यह मुसलमानों के खिलाफ है, ऐसा कहने वाले अपने इरादों में काफी हद तक कामयाब भी रहे तो इसकी वजह मुस्लिम समाज में फैली अज्ञानता और अशिक्षा इसकी सबसे बड़ी वजह है। आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस को छोड़कर सीएए/एनआरसी या फिर एनपीआर का विरोध करने वाला कोई नेता खुलकर सामने नहीं आ रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कुछ मुस्लिम नेता और जमातें जरूर विरोध का बिगुल बजा रही हैं। यह वह ताकतें हैं जिन्होंने मोदी सरकार के हर फैसले का विरोध करना अपना सियासी एजेंडा बना रखा है। इन्होंने मोदी सरकार के हर काम चाहे वह तीन तलाक को खत्म किया जाना, कश्मीर से धारा 370 हटाना, पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक हो या फिर सुप्रीम कोर्ट की ओर से राम मंदिर को लेकर किये गये फैसले का विरोध हो, यह लोग सीएए के खिलाफ जहर उगलने का काम लगातार कर रहे हैं।


बहरहाल, तमाम किन्तु−परंतुओं के बीच अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार देशहित के मामले में बिल्कुल भी पीछे हटने को तैयार नहीं नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के दौरे के दौरान भी सीएए को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करके वस्तुस्थिति और भी साफ कर दी। पीएम मोदी ने जम्मू−कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और नागरिकता कानून में संशोधन करने के फैसलों पर जिस तरह दो टूक ढंग से यह कहा कि वह इनसे पीछे हटने वाले नहीं हैं, उससे देश के साथ−साथ अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के पास भी साफ मैसेज गया होगा कि मोदी सरकार के रहते भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देना आसान नहीं है। मोदी सरकार को किसी तरह दबाव में नहीं लिया जा सकता। देशभर में सीएए का विरोध करने वाली कथित ताकतों के साथ−साथ दुश्मन मुल्कों भी यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखकर वहां की सरकार द्वारा लिए फैसलों पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी संप्रभु देश को अपने देशहित की चिंता करने का अधिकार है। विश्व के कुछ देशों की ओर से भारत पर दबाव डालने की जो कोशिश की जा रही है वह मूलतः देश के भीतर कुछ लोगों द्वारा असहमति की आवाज उठाने का परिणाम है।



 

भारत में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बने कानून को लेकर विश्व बिरादरी में थोड़ी−बहुत आशंका जताई जा रही है तो इसके लिए देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और उसमें भी अधिक गांधी परिवार जिम्मेदार है जो जनता द्वारा सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद भी यह समझने को तैयार नहीं है कि हिन्दुस्तान गांधी परिवार की बपौती नहीं है। अच्छा होता देशहित में गांधी परिवार सार्थक राजनीति करता, सब जानते हैं कि मोदी सरकार कई मोर्चो पर विफल रही है, लेकिन राहुल−प्रियंका जैसे नेता परिपक्वता के अभाव में कभी दंगाइयों के साथ तो कभी टुकड़े−टुकड़े गैंग के साथ खड़े हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि गांधी परिवार, मोदी के सामने उनसे बड़ी 'लाइन' खींचने की बजाए इस कोशिश में लगा है कि कैसे मोदी 'लाइन' मिटा दी जाए।

 

लब्बोलुआब यह है कि जो लोग कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने और नागरिकता संशोधन कानून के फैसलों का विरोध करने में लगे हैं वे यह समझें कि मोदी सरकार अपने निर्णय से इस तरह पीछे नहीं हटने वाली है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जो भी यह समझ रहे हैं कि धरना−प्रदर्शन, आंदोलन आदि से सरकार किसी भी तरह के दबाव में आ जाएगी वे भूल ही कर रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि प्रधानमंत्री ने और अधिक अडिग इरादों का प्रदर्शन किया है। यहां यह बात भी समझ लेना जरूरी है कि सीएए का विरोध करने वाले अपने पैरों पर भी कुल्हाड़ी मारने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। अगर ऐसा न होता तो गृह मंत्री अमित शाह का सीएए का विरोध करने वालों को बातचीत का निमंत्रण दिए जाने का वो हश्र नहीं होता जैसा देखने को मिला। अमित शाह ने एक निजी न्यूज चैनल पर चर्चा के दौरान कहा था कि सीएए का विरोध करने वाले अगर चाहें तो वह उनसे आकर मिल सकते हैं। उन्हें तीन दिन में मिलने का समय दे दिया जाएगा, लेकिन मंत्री के निमंत्रण पर शाहीन बाग में बैठे लोग एक मंझे हुए नेता की तरह सियासत करने लगे। गृह मंत्रालय चाहता था कि शाहीन बाग में धरना−प्रदर्शन करने वालों का प्रतिनिधिमंडल आकर उनसे मिले, परंतु शाहीन बाग में बैठा हर शख्स अपने को नेता बताते हुए अड़ गया कि सब लोग (करीब चार−पांच हजार लोग) मिलने जाएंगे। पुलिस प्रदर्शनकारियों को समझाती रही कि वह अपने प्रतिनिधिमंडल का नाम बताए जिनकी मंत्री अमित शाह से मुलाकात करा दी जाए, लेकिन सब के सब प्रदर्शनकारी एक साथ चल पड़े। हालात बिगड़े न इसलिए पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रास्ते में ही रोक लिया। इस तरह बाचचीत का सुनहरा मौका प्रदर्शनकारियों ने गंवा दिया। इसके साथ ही यह भी साफ हो गया कि प्रदर्शनकारी राजनीति कर रहे हैं। आखिर जब केंद्र सरकार इस कानून पर असहमत लोगों के संदेह का निवारण करने के लिए तैयार थी तब फिर इसका कोई औचित्य नहीं बचा था कि वे धरना−प्रदर्शन करें।


इसी प्रकार से बात सीएए से हटकर कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने की कि जाए तो जो लोग इस मामले में यह दलील देने में लगे थे कि यह कश्मीर को शेष भारत से जोड़ने वाला पुल था तो अब यह समझ गए हैं कि यह एक अस्थायी अनुच्छेद था और ऐसे किसी अनुच्छेद को स्थायित्व प्रदान करने का कहीं कोई औचित्य नहीं था। 370 हटाना भले ही एक मुश्किल कार्य रहा हो, लेकिन यह इसलिए आवश्यक हो गया था, क्योंकि एक तो यह अलगाव को जन्म दे रहा था और दूसरे कश्मीर के लोगों में भेदभाव कर रहा था। जम्मू−कश्मीर में विकास नहीं हो पा रहा था। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि जो लोग स्वयं को संविधान और लोकतंत्र का हितैषी बताते रहते थे, वह नागरिकता संशोधन कानून पर संविधानसम्मत व्यवहार करने से भी इन्कार कर रहे हैं। यह किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है कि वह संसद द्वारा पारित और अधिसूचित कानून को वापस ले ले। फिर चाहे पंजाब की बात हो या फिर अन्य कांग्रेस शासित राज्यों की अथवा पश्चिम बंगाल, केरल की, कोई कुछ भी कहे उसे सीएए तो लागू करना ही होगा। समय आ गया है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का नाटक बंद करके आगे देखा जाए। वर्ना इसमें उलझे रहने से सबका और खासकर देश का काफी नुकसान होगा।