बाजार के कारण हिन्दी बन रही है विदेशियों के भी रोजगार की भाषा



जोल्ली ने साथ बातचीत में कहा कि उन्होंने इटली और दुबई में हिन्दी के ऐसे कोर्स तैयार किये जो विशेषतौर पर बिजनेस एक्जिक्यूटिव और प्रबंधन से जुड़े लोगों के लिए बनाए गए थे।




भोपाल। भारत के विशाल बाजार के कारण हिन्दी अब विदेशी लोगों के रोजगार की भी भाषा बन रही है और कई देशों में व्यापार प्रबंधन और मार्केटिंग से जुड़े लोग इसे सीख रहे हैं। यह मानना है विदेशों में हिन्दी पढ़ाने वाले विदेशी हिन्दी विशेषज्ञों का। मूलत: वेनिस के रहने वाले मार्को जोल्ली इटली के कुछ विश्वविद्यालयों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ा चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब यूरोपीय को भी यह महसूस होने लगा है कि यदि भारत के साथ व्यापार करना है तो हमें यहां सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी को सीखना पड़ेगा।


जोल्ली ने साथ बातचीत में कहा कि उन्होंने इटली और दुबई में हिन्दी के ऐसे कोर्स तैयार किये जो विशेषतौर पर बिजनेस एक्जिक्यूटिव  और प्रबंधन से जुड़े लोगों के लिए बनाए गए थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को जो हिन्दी सिखायी जाती है, वह प्राचीन नहीं बल्कि आम बोलचाल की हिन्दी है।उन्होंने अपना एक अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके कोर्स में शामिल रही एक लड़की का जब दुबई में भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी में साक्षात्कार हुआ तो लोग उसकी हिन्दी को देखकर दंग रह गये क्योंकि वह बिल्कुल आम बोलचाल वाली हिन्दी बोल रही थी।जोली की पत्नी भी हिन्दी में पीएचडी कर चुकी हैं। वह इस समय वाराणसी में एक हिन्दी स्टडी सेंटर भी चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके हिन्दी प्रेम के कारण उनका हिन्दुस्तान प्रेम कई गुना बढ़ गया। इस्राइल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के पूर्व एशिया विभाग में हिन्दी पढ़ाने वाले डा. गेनादी श्लोम्पेर ने ताशकंद में हिन्दी की पढ़ाई की थी। 


विदेशों में रोजगार के लिहाज से हिन्दी के महत्व के बारे में उनका मानना है कि भारत से व्यापार करने वाली कंपनियों को हिन्दी जानने वालों की आवश्यकता अक्सर पड़ती है। उन्होंने माना कि तेल अवीव विश्वविद्यालय में हिन्दी की तुलना में चीनी और जापानी भाषा पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक है। फिर भी लोग भारतीय सभ्यता और हिन्दी फिल्मों के कारण हिन्दी की ओर आकर्षित अवश्य होते हैं। उन्होंने कहा कि शायद ही कोई इस्राइली हो जिसने हिन्दी फिल्म या इसके गाने न देखे हों।डा. श्लोम्पेर ने स्वीकार किया कि हिब्रू भाषा में हिन्दी साहित्य का अधिक अनुवाद नहीं हुआ। किंतु उन्होंने काफी उम्मीदों के साथ कहा कि अब उनके द्वारा पढ़ायी गयी पीढ़ी, हिन्दी साहित्य को उनके देश की भाषा में अनुदित करेगी।अर्मेनिया के येरवान से आयी हिन्दी विद्वान हृपसीमे ने शुरू में विदेशी भाषा को सीखने की ललक के कारण हिन्दी सीखी। उन्होंने रामायण कथा को संक्षिप्त करते हुए इसे अपने देश की भाषा में अनुवाद किया।हिन्दी में रोजगार की संभावना पर उनका मानना है कि उनके देश में अनुवाद और दुभाषिया कामों के लिए ही अक्सर इसकी आवश्यता पड़ती है। हृपसीमे ने यह भी स्वीकार किया कि वह अपने हिन्दी प्रेम के कारण भारत बार बार आना पसंद करती हैं।




राजकपूर, मिथुन चक्रवर्ती और शाहरुख खान की फिल्मों की दीवानगी के कारण हिन्दी सीखने वाली कजाख्सतान में अल फराबी कजख राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की दरीगा कोकएवा मानती हैं कि सोवियत संघ से अलग हुए लगभग सभी देशों में हिन्दी को लेकर एक आकर्षण है।  उन्होंने कहा कि उनके शिक्षण संस्थान में भी जो लोग हिन्दी पढृने आते हैं, उनमें से अधिकतर का उद्देश्य इसे रोजगार से जोड़ना होता है।दरीगा को इस बात का अफसोस है कि वहां हिन्दी सीखने वाले छात्रों को हिन्दी की समुचित किताबें नहीं मिल पाती हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए कजाख्सतान में भारतीय दूतावास को हिन्दी पुस्तकों के लिए अधिक आर्थिक मदद दी जानी चाहिए। ये चारों विदेशी विद्वान यहां टैगोर अंतरराष्ट्रीय कला साहित्य महोत्सव में भाग लेने के लिए यहां आए थे । इनके साथ ही कई अन्य विदेशी हिंदी विद्वान और प्रवासी हिंदी साहित्यकार इस चार दिवसीय महोत्सव में शामिल हो रहे हैं।